वर्ष 1914 भारत का वो दौर था जब मोहनदास करमचंद गांधी दक्षिण अफ्रीका से भारत लौटे थे और उसके बाद गु़लाम भारत में मानो एक क्रांति आ गई थी. ये वही साल था जब धुंडिराज गोविंद फाल्के नाम का एक शख़्स भी लंदन से मुंबई लौटा था.इतिहास मोहनदास करमचंद गांधी को आज राष्ट्रपिता के तौर पर याद करता है तो धुंडिराज गोविंद फाल्के यानी दादा साहेब फाल्के भारत में सिनेमा के पितामाह कहलाए.भुला दिया दादा साहेब फाल्के को?
नासिक के पास त्रिंबकेश्वर नामक गांव में 30 अप्रेल 1870 को धुंडिराज गोविन्द फाल्के का जन्म हुआ.उनकी उम्र करीब 41 वर्ष की रही होगी जब लक्ष्मी प्रींटिंग प्रेस की भागीदारी से उन्हें अन्यायपूर्ण ढंग से अलग कर दिया गया. उसके बाद वे दोपहर के वक़्त बगीचे में अपना टिफिन खोलकर भोजन करने जा रहे थे कि अखबार का एक टुकड़ा हवा में उड़कर उनके पास आ गिरा.इसमें उन्होंने ‘द लाइफ आइफ़ क्राइस्ट’ नामक कथा फ़िल्म के प्रदर्शन का विज्ञापन देखा और शाम को आठ आने का टिकिट लेकर उन्होंने फिल्म देखी!









