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आइये, जाने, समझें और जुडें अपने पहाड़ से, अपने उत्तराखण्ड से, अपने अल्मोड़ा से . . .

अल्मोड़ा एक नज़र . . .


"अल्मोड़ा भारतीय राज्य अल्मोड़ा जिला का मुख्यालय है। अल्मोड़ा अपनी सांस्कृतिक विरासत, हस्तकला, खानपान, और वन्य जीवन के लिए प्रसिद्ध है।
हल्द्वानी, काठगोदाम और नैनीताल से नियमित बसें अल्मोड़ा जाने के लिए चलती हैं। ये सभी बसे भुवाली होकर जाती हैं। भुवाली से अल्मोड़ा जाने के लिए रामगढ़, मुक्तेश्वर वाला मार्ग भी है। परन्तु अधिकांश लोग गरमपानी के मार्ग से जाना ही अदिक उत्तम समझते हैं। क्योंकि यह मार्ग काफी सुन्दर तथा नजदीकी मार्ग है।भुवाली, हल्द्वानी से ४० कि.मी. काठगोदाम से ३५ कि.मी. और नैनीताल से ११ कि.मी. की दूरी पर स्थित है। तथा भुवाली से अल्मोड़ा ५५ कि.मी. की दूरी पर बसा हुआ है।"

शुक्रवार, 26 फ़रवरी 2010


यू तो भारत में कई त्यौहार मनाये जाते हैं परन्तु होली एक ऐसा त्यौहार है जो सभी धर्म व संप्रदाय के लोगों द्वारा उत्साह पूर्वक मनाया जाता है। होली का जिक्र आते ही आंखों के आगे एक सतरंगी माहौल छा जाता है। रंग-बिरंगे अबीर ,गुलाल ,पिचकारी .गुब्बारे हो या फिर गुजिया, मिठाई आदि पकवान ये सभी होली आते ही अपने अस्तित्व का एहसास कराते हैं।

होली का त्यौहार इसलिए भी अधिक महत्वपूर्ण है क्योंकि इसे प्रेम और भाईचारे का पर्व कहा जाता है। कहते हैं कि होली के दिन सभी लोग अपने पुराने गिले शिकवे भुलाकर एक-दूसरे के गले लग जाते हैं । छोटा हो या बड़ा ,बूढा हो या सभी वर्ग के लोग इस त्यौहार का बर्पूर आनंद लेते हैं।

इस रंगीन त्यौहार से कई पौराणिक कथाएँ भी जुड़ी हैं। इनमें से भक्त प्रहलाद कि कथा सर्वविदित है। कहते हैं कि इस दिन ह्रिन्यकश्य्प कि बहिन होलिका ने भक्त प्रहलाद को अपनी गोद में बिठाकर अग्नि में जलाने कि चेष्टा की थी। ,किंतु वह प्रहलाद को तो न जला सकी अपितु स्वयं अग्नि में जलकर भस्म हो गई। यहाँ बुराई पर अच्छाई कि जीत का उदहारण देखने को मिलता है। होलिका बुराई का प्रतीक है और प्रहलाद अच्छाई का प्रतीक है। इसलिए आज देशभर में होली के दिन होलिका दहन करने की प्रथा है। होलिका की अग्नि में सभी बुराइयों को दहन कर स्वच्छ और पवित्र आचरण का आवाहन किया जाता है।

होली की प्रसिद्धि का एक कारण फिल्मों में इस त्यौहार को सुंदर दृश्यों व गानों से सजाकर दिखाया जाना भी है। कितने ही संगीतकारों और लेखकों ने होली पर्व की रंग-बिरंगी झलकियों को शब्दों और सुरों में पिरोकर इसे और भी रूमानी बना दिया है।

* होली के दिन दिल खिल जाते हैं रंगों में रंग मिल जाते हैं
* पिया संग खेलूँ होली फागुन आयो रे
* होली आई रे कन्हाई रंग छलके सुनादे जरा बांसुरी
* तन रंग लो जी आज मन रंगलो ,तन रंगलो
* रंग बरसे भीगे चुनरवाली रंग बरसे


ये सभी गीत हमें होली के रंग में सराबोर कर देते हैं।

होली के पर्व को कृष्ण भक्ति से भी जोड़ा जाता है। होली आते ही मथुरा ,वृन्दावन और बरसाने की रंगत देखने लायक होती है। बरसाने की लठ्ठमार होली हो या फिर मथुरा वृन्दावन में खेली जाने वाली फूलों की होली , ये आज भी कृष्ण भक्ति और रासलीला की झलक दिखाती हैं।

फागुन का महीना हो ,रंगों की बौछार हो और उत्तरांचल की होली का जिक्र न किया जाए ,हो ही नही सकता । यू उत्तराँचल छोटा सा राज्य है किंतु यहाँ होली की छटा देखते ही बनती है। फागुन का महीना लगते ही यहाँ होली की धूम शुरू हो जाती है। लोग टोली बनाकर घर-घर में जाकर होली के गीत गाते हैं। इन होली के गीतों में प्रभु राम-कृष्ण के भजन शामिल होते हैं। गाने की तर्ज के हिसाब से गीतों को खड़ी होली और बैठी होली आदि भागों में विभाजित किया जाता है। यहाँ लोग होली पर एक पेड़ पर चीर बांधते हैं और होलिका दहन के दिन उस पेड़ को जलाया जाता है।अगले दिन अबीर-गुलाल से सराबोर लोग नाचते गाते हुए घर-घर जाकर मंगल गीत गाते हैं और प्रेम व भाईचारे को बढावा देते हैं।

हांलाकि आज हमारे परिवेश में काफी बदलाव आ गया है । लोग अपनी सांस्कृतिक धरोहरों से दूर होते जा रहे हैं। फिर भी ऐसे में होली ,दिवाली आदि तीज-त्यौहार एक दिए की तरह हैं जो अंधेरे में रौशनी की किरण बन फैल रहे हैंऔर हमारी संस्कृति व सभ्यता को जीवित किए हुए हैं। ---------------

अंधेरे में रौशनी की किरण बन फैल जाते हैं,

ये त्यौहार ही हमें हमारी संस्कृति का एहसास कराते हैं ।

करीब रहकर भी जो न मिल सके अपनों से ,

होली दिवाली के पर्व उन्हें करीब लाते हैं।

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इतिहास

प्राचीन अल्मोड़ा कस्बा, अपनी स्थापना से पहले कत्यूरी राजा बैचल्देओ के अधीन था। उस राजा ने अपनी धरती का एक बड़ा भाग एक गुजराती ब्राह्मण श्री चांद तिवारी को दान दे दिया। बाद में जब बारामण्डल चांद साम्राज्य का गठन हुआ, तब कल्याण चंद द्वारा १५६८ में अल्मोड़ा कस्बे की स्थापना इस केन्द्रीय स्थान पर की गई। कल्याण चंद द्वारा चंद राजाओं के समय मे इसे राजपुर कहा जाता था। 'राजपुर' नाम का बहुत सी प्राचीन ताँबे की प्लेटों पर भी उल्लेख मिला है।

६० के दशक में बागेश्वर जिले और चम्पावत जिले नहीं बनें थे और अल्मोड़ा जिले के ही भाग थे।

भूगोल

अल्मोड़ा कस्बा पहाड़ पर घोड़े की काठीनुमा आकार के रिज पर बसा हुआ है। रिज के पूर्वी भाग को तालिफत और पश्चिमी भाग को सेलिफत के नाम से जाना जाता है। यहाँ का स्थानीय बाज़ार रिज की चोटी पर स्थित है जहाँ पर तालिफत और सेलिफत संयुक्त रूप से समाप्त होते हैं।

बाज़ार २.०१ किमी लम्बा है और पत्थर की पटियों से से ढका हुआ है। जहाँ पर अभी छावनी है, वह स्थान पहले लालमंडी नाम से जाना जाता था। वर्तमान में जहाँ पर कलक्टरी स्थित है, वहाँ पर चंद राजाओं का 'मल्ला महल' स्थित था। वर्तमान में जहाँ पर जिला अस्पताल है, वहाँ पर चंद राजाओं का 'तल्ला महल' हुआ करता था।

सिमलखेत नामक एक ग्राम अल्मोड़ा और चमोली की सीमा पर स्थित है। इस ग्राम के लोग कुमाँऊनी और गढ़वाली दोनो भाषाएँ बोल सकते हैं। पहाड़ की चोटी पर एक मंदिर है, भैरव गढ़ी।

गोरी नदी अल्मोड़ा जिले से होकर बहती है।


अल्मोड़ा जिले का खत्याड़ी कस्बा

अल्मोड़ा में एक प्रसिद्ध नृत्य अकादमी है, डांसीउस - जहाँ बहुत से भारतीय और फ्रांसीसी नर्तकों को प्रक्षिक्षण दिया गया था। इसकी स्थापना उदय शंकर द्वारा १९३८ में की गई थी। अल्मोड़ा नृत्य अकादमी को कस्बे के बाहर रानीधारा नामक स्थान पर गृहीत किया गया। इस स्थान पर से हिमालय और पूरे अल्मोड़ा कस्बे का शानदार दृश्य दिखाई देता है।

"इन पहाड़ों पर, प्रकृति के आतिथ्य के आगे मनुष्य द्वारा कुछ भी किया जाना बहुत छोटा हो जाता है। यहाँ हिमालय की मनमोहक सुंदरता, प्राणपोषक मौसम, और आरामदायक हरियाली जो आपके चारों ओर होती है, के बाद किसी और चीज़ की इच्छा नहीं रह जाती। मैं बड़े आश्चर्य के साथ ये सोचता हूँ की क्या विश्व में कोई और ऐसा स्थान है जो यहाँ की दृश्यावली और मौसम की बराबरी भी कर सकता है, इसे पछाड़ना तो दूर की बात है। यहाँ अल्मोड़ा में तीन सप्ताह रहने के बात मैं पहले से अधिक आश्चर्यचकित हूँ की हमारे देश के लोग स्वास्थ्य लाभ के लिए यूरोप क्यों जाते है।" - महात्मा गांधी

२००१ की भारतीय जनगणना के अनुसार, अल्मोड़ा जिले की जनसंख्या ६,३०,५६७ है।

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